Wednesday, May 6, 2009

बढ़े चलो-

द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे

ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं

सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर, हटो नहीं
तुम निडर, डटो वहीं

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

pathik se

पथ भूल न जाना पथिक कहीं
पथ में कांटे तो होंगे ही,
दूर्वादल-सरिता, सर होंगे।
सुंदर गिरी-वन-वापी होंगी,
सुंदर-सुंदर निर्झर होंगे।
सुंदरता की मृग-तृष्णा में,
पथ भूल न जन पथिक कहीं।
जब कठिन कर्म-पगडण्डी पर,
राही का मन उन्मुख होगा.
जब सपने सब मिट जायेंगे,
कर्तव्य मार्ग सम्मुख होगा.
तब अपनी प्रथम विफलता में
पथ भूल न जाना पथिक कहीं.
रणभेरी सुन, कह,"विदा,विदा"
जब सैनिक पुलक रहे होंगे.
हाथों में कूम-कूम थल लिए
कुछ जलकन ढुलक रहे होंगे.
कर्तव्य प्रेम की उलझन में
पथ भूल न जन पथिक कहीं.
कुछ मस्तक कम परते होंगे,
जब महाकाल की माला में.
माँ मांग रही होगी आहुति,
जब स्वतंत्र की ज्वाला में.
पल भर भी पर अस्मंजुस में,
पथ भूल न जन पथिक कहीं.
................... डॉ. सिव्मंगल सिंह सुमन .

Tuesday, May 5, 2009

तोड़ना चाह भी हमने उस बेवफा से हर एक रिश्ता,
दिल ऐ खाना ख़राब ने ये होने भी न दिया